Kavita · Hindi (हिन्दी)
राष्ट्र पहले, सिंहासन बाद में
Rashtra Pehle, Singhasan Baad Mein
न मंदिर से, न मस्जिद से, न नारों की तलवारों से,
भारत बनता है भारत, इसके लोगों के अधिकारों से।
यह देश किसी की जागीर नहीं, न सत्ता का गलियारा है,
यह उस माँ का आँचल है, जिसने सबको एक-सा पुकारा है।
धर्म तुम्हारा पूज्य रहे, पर देश से ऊँचा हो कैसे?
जो घर ही जलने दे अपना, वह दीप उजाला दे कैसे?
माथे का तिलक, गले का क्रॉस, या सजदे की पहचान रहे,
पर सबसे पहले इंसान बचें, फिर धर्मों का सम्मान रहे।
किसने तुमसे कह दिया कि प्रश्न उठाना गद्दारी है?
किसने समझा दिया कि सत्ता ही भारत की अधिकारी है?
जो कल तक आज़ादी माँगें, वे आज सवालों से डरते हैं,
जो सच के साथ खड़े होते, वे कब सिंहासनों से डरते हैं?
सुनो, वतन केवल नक़्शा नहीं, सीमाओं की रेखा नहीं,
वतन किसी की कुर्सी नहीं, कोई सत्ता की लेखा नहीं।
वतन वही है जहाँ गरीब भी सिर उठाकर जी सकता है,
जहाँ एक साधारण नागरिक भी शासक से प्रश्न कर सकता है।
लोकतंत्र का अर्थ समझना, केवल मत डालना नहीं,
पाँच बरसों में एक दिन अपना अधिकार निकालना नहीं।
लोकतंत्र वह दीपक है जो हर अँधेरे से लड़ता है,
राजा जब भी भूल करे, जनता बनकर प्रश्न उभरता है।
यदि प्रश्नों पर पहरे हों, यदि आवाज़ों पर ताले हों,
यदि सच बोलने वालों के हिस्से केवल अँधियारे हों,
तो याद करो, इतिहास कभी चुप्पी को माफ़ नहीं करता,
जो जन की पीड़ा सुनता नहीं, जन उसको साफ़ नहीं करता।
कल जिन हाथों ने बेड़ियाँ तोड़ी थीं सीना तानकर,
क्या आज उन्हीं हाथों को डरना होगा प्रश्न उठाकर?
क्या आज़ादी का अर्थ यही, बस झंडा ऊँचा लहराना है?
या अन्याय के सम्मुख भी सच का दीपक जलाना है?
भगत सिंह की आँखों में जो भारत का सपना पलता था,
वह भारत केवल नारों से कब आज़ाद हुआ करता था?
वह चाहता था सोच जगे, हर मन में तर्क की ज्योति जले,
इंसान किसी इंसान के आगे डरकर नहीं, अधिकार से चले।
सत्ता आए, सत्ता जाए, यह समय का दस्तूर रहे,
पर संविधान का माथा ऊँचा, जनता का भरपूर रहे।
कुर्सी का कद कितना भी हो, कानून से ऊँचा क्या होगा?
जनता से बढ़कर इस धरती पर कोई फैसला क्या होगा?
मज़हब के नाम पर बाँटोगे, तो किसका मान बढ़ाओगे?
अपने ही घर की दीवारों में कितने देश बनाओगे?
जिस मिट्टी में सबकी मेहनत, सबके पुरखों का पसीना है,
उस मिट्टी पर किसका दावा? यह भारत सबका नगीना है।
किसी की पूजा मत छीनो, किसी की प्रार्थना मत रोको,
पर धर्म बचाने के नाम पर इंसान का रास्ता मत रोको।
ईश्वर को पाने निकले हो, तो इतना याद रखो,
जो मानव का दर्द न समझे, उस भक्ति पर भी प्रश्न रखो।
और सुनो, ऐ नौजवानों, तुम भविष्य के रखवाले हो,
तुम केवल भीड़ नहीं हो, तुम इतिहास के उजियाले हो।
न अंधभक्ति में आँखें मूँदो, न नफ़रत को हथियार करो,
सच को सच और झूठ को झूठ कहने का अधिकार करो।
तुम्हारे हाथों में पत्थर नहीं, विचारों की मशाल रहे,
तुम्हारे होठों पर प्रश्न रहें, दिल में भारत विशाल रहे।
तुम विरोध करो तो सत्य के लिए, प्रतिशोध के लिए नहीं,
तुम लड़ो अधिकारों के लिए, इंसान के विनाश के लिए नहीं।
आज अगर ख़ामोश रहे, कल शब्द कहाँ से लाओगे?
जब प्रश्नों पर पहरे होंगे, तब गीत कहाँ से गाओगे?
आज किसी और की आवाज़ है, कल तुम्हारी भी हो सकती है,
आज किसी और की राह रुकी, कल तुम्हारी भी हो सकती है।
नफ़रत के सौदागर सुन लें, यह देश बिकाऊ नहीं,
जनता का स्वाभिमान किसी सिंहासन का साया नहीं।
हम देश के हैं, देश हमारा, इतना ही अभिमान रहे,
जो भारत को बाँटने निकले, उससे बड़ा संविधान रहे।
याद रहे, ऐ आने वाली सदियों के इतिहासकार,
जब लिखना तुम इस दौर की कथा, रखना इतना विचार।
हमने केवल शासन नहीं, अपने समय को भी परखा था,
हमने डर के घने अँधेरों में अधिकारों को ललकारा था।
यदि उस युग में सच कहना भी साहस का काम बना,
यदि प्रश्न उठाना आम जनों के हिस्से का संग्राम बना,
तो लिखना, उस पीढ़ी ने फिर भी उम्मीद नहीं छोड़ी थी,
टूटती हुई आवाज़ों ने भी आज़ादी की लौ जोड़ी थी।
क्योंकि भारत कोई चेहरा नहीं, कोई दल, धर्म, परिवार नहीं,
भारत जनता की साँसों का है, किसी एक का अधिकार नहीं।
यह देश रहेगा तब तक, जब तक न्याय की आस रहे,
जब तक अंतिम जन के मन में अपने होने का विश्वास रहे।
न मंदिर हारे, न मस्जिद हारे, न इंसानियत लाचार हो,
न सत्ता इतनी बड़ी बने कि जनता ही बेकार हो।
धर्म हृदय में, देश शिखर पर, संविधान आधार रहे,
भारत केवल आज़ाद नहीं, हर युग में आज़ाद रहे।
एक अंतिम बात...
देश से प्रेम केवल उसका गुणगान करना नहीं,
उसके लोगों के अधिकारों की रक्षा करना भी है।
“क्योंकि राष्ट्र सबसे पहले है,
और राष्ट्र का अर्थ है, उसके लोग।”
“वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य”
भारतीय संविधान · अनुच्छेद 19(1)(क)