الفاظ alfaazsujalke

Kavita · Hindi (हिन्दी)

ऊन बुनती वो औरत...

Oon Bunti Wo Aurat

“सर्दियों से ज्यादा, यादें गर्म रखती हैं”

लौटा दे वो सर्द सवेरा, आंगन वाली धूप,
जहाँ ऊन के गोलों में था, ममता का एक रूप,
कोमल-कोमल उंगलियों में, धागे जब खो जाते थे,
चरखे की उस 'चर्र-चर्र' में, हम बेफिक्र सो जाते थे,
धूप में बैठी मूरत वो, और समय का पहिया धीमा,
सी देती थी हर उधड़े को, न कोई शर्त न कोई सीमा,
वो फंदों में यादें बुनना, वो धागों की सरगोशी,
शोर-शराबे से बेहतर थी, उसकी वो खामोशी,
तू देता है सबको उनकी, मर्जी के ही मुताबिक,
मुझको बस वो 'बुनती औरत', लौटा देना तू मालिक।।

ना चाहिए ये शहर का मफलर, जिस्म तो ढंक जाएगा,
पर रूह को गर्माहट वाला, सुकून न मिल पाएगा,
यहाँ लोग तो बुनते रिश्ते, सिर्फ नफा और काम के,
कहाँ मिलेंगे धागे वो अब, निश्छल और आराम के?
मखमल के गद्दों पर भी अब, नींद नहीं वो आती है,
उस स्वेटर की खुरदरी छुअन, आज बहुत तड़पाती है,
हो सके तो वक्त को तू, थोड़ा पीछे मोड़ दे,
मेरी सांसों की डोरी को, उस चरखे से जोड़ दे,
बस इतनी सी अर्जी मेरी, सुन लेना ओ कातिब,
मुझको बस वो 'बुनती औरत', लौटा देना तू मालिक...!