الفاظ alfaazsujalke

Ghazal · Urdu (उर्दू)

हिज्र-ए-नूर

Hijr-e-Noor

फुर्क़तों की चादर में लिपटी है हर शाम मेरी,
तेरे बगैर अधूरी सी है तक़रीब-ए-सलाम मेरी।
हर सदी के साए में तन्हा दिल ने ये जाना,
तेरे इश्क़ में डूबी हुई है अब मुकम्मल नियाम मेरी॥

हर दुआ अधूरी, हर सदा बेजुबाँ सी है,
तेरे बगैर ये रूह भी अब सियाह मकाँ सी है।
हिज्र की हर लहर में बस तेरा नाम गूँजे,
बेपनाह उलझनों में भी कुछ दिलकश अज़ाँ सी है॥

ग़म की स्याही से जब क़लम बोलने लगा,
हर मिसरा मेरा इक दर्द खोलने लगा।
बंदिशों के दौर में भी जब सूफ़ियाना रहा,
तो हर लफ़्ज़ मेरे हुज़ूर को डोलने लगा॥

तेरी रहमत का असर कुछ इस तरह हुआ,
सुकून भी रो पड़ा, जब तू कहीं न हुआ।
हसरतों का हिसाब अब किससे करूँ मैं,
तेरा नाम ही अब मेरी तौहीन का मरहम हुआ॥

नक़्श बनाते रहे हम तेरे क़दमों के निशाँ से,
खुदा से भी लिपटे रहे तेरी ही अज़ाँ से।
इश्क़ अगर बंदगी है, तो बसा है तू सीनों में,
तेरे सजदों से जुड़ी है मेरी हर अना की ज़ुबाँ से॥

अब जो भी लिखूँ, बस तेरा तज़किरा निकले,
हर हर्फ़ में तेरा नूर-ए-खुदा सा दिखे।
मैं न था कुछ भी, जब तक तू न मिला,
अब जो हूँ, तो हूँ- "alfaazsujalke"॥